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Saturday, 16 September 2017

आईना

आईना कुछ नहीं नज़र का धोखा हैं,
नज़र वही आता हैं जो दिल में होता हैं.
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आईना भला कब किसी को सच बता पाया है.
जब भी देखो दांया, तो बायां नज़र आया है.
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अपनी आँखों का सच भी ना कभी दिखा होता ,
ग़र ना अक्स उनका हमें आइने में दिखा होता !
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परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता
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घर मेरी उम्मीदों के सरहद पार तेरा है
दिल के आइने में फिर भी इंतज़ार तेरा है
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आईना देखते हैँ वो छुप छुप के बार-बार,
कभी जुल्फेँ बिगाङ कर कभी जुल्फेँ सँवार कर.
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किरआज टूट गया तो बचकर निकलते है,
कल आईना था तो रुक-रुक कर देखते थे.
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दार अपना पहले बनाने की बात क़र,
फिर आइना किसी को दिखने की बात कर.
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आइना और दिल का एक ही फ़साना हैं,
आखिरी अंजाम दोनों का टूट कर बिखर जाना हैं.
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आईने के पीछे रहकर हासिल न कुछ तुम्हे होगा,
सामने आओ आईने के हकीक़त से सामना होग।