Saturday, 16 September 2017

आईना

आईना कुछ नहीं नज़र का धोखा हैं,
नज़र वही आता हैं जो दिल में होता हैं.
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आईना भला कब किसी को सच बता पाया है.
जब भी देखो दांया, तो बायां नज़र आया है.
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अपनी आँखों का सच भी ना कभी दिखा होता ,
ग़र ना अक्स उनका हमें आइने में दिखा होता !
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परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता
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घर मेरी उम्मीदों के सरहद पार तेरा है
दिल के आइने में फिर भी इंतज़ार तेरा है
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आईना देखते हैँ वो छुप छुप के बार-बार,
कभी जुल्फेँ बिगाङ कर कभी जुल्फेँ सँवार कर.
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किरआज टूट गया तो बचकर निकलते है,
कल आईना था तो रुक-रुक कर देखते थे.
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दार अपना पहले बनाने की बात क़र,
फिर आइना किसी को दिखने की बात कर.
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आइना और दिल का एक ही फ़साना हैं,
आखिरी अंजाम दोनों का टूट कर बिखर जाना हैं.
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आईने के पीछे रहकर हासिल न कुछ तुम्हे होगा,
सामने आओ आईने के हकीक़त से सामना होग।

Friday, 23 September 2016

उसी की है...

"मुझ में ख़ुशबू बसी उसी की है,
जैसे ये ज़िंदगी उसी की है,
वो कहीं आस-पास है मौजूद,
हू-ब-हू ये हँसी उसी की है,
यानी कोई कमी नहीं मुझ मे,
यानी मुझ में कमी उसी की है,
क्या मिरे ख़्वाब भी नहीं मिरे
क्या मिरी नींद भी उसी की है.

Saturday, 27 August 2016

कोई आज पहली बार मिला

" है दिल में प्यार ज़ुबाँ चुप झुकी झुकी नज़रें
अजब अदा से कोई आज पहली बार मिला,
किसी को पा के मेरे दिल का हाल मत पूछो
कि जैसे सारे ज़माने पे इख़्तियार मिला,
किसी ने पूरे किये आज प्यार के वादे
मेरी वफ़ा का सिला मुझ को शानदार मिला,
मैं ख़ुशनसीब हूँ मुझ को किसी का प्यार मिला
बड़ा हसीन मेरे दिल का राज़दार मिला,
मेरे चमन का हर एक फूल मुस्कुराने प्यलगा
वो क्या मिले मुझे मौसम-ए-बहार मिला."

कभी हम न थे कभी तुम न थे

"कभी हम न थे कभी तुम न थे,
ये जिंदगी के लम्हे यूं ही तनहा थे,
बहुत गुजारा पर ये शाम न गुजरी,
कितने फासले तेरे मेरे दरमियां थे,
था पास ही तु दूर न था,
पर खामोशियों के दायरे बेशुमार थे,
चाहा के भी न निकले कुछ लफ्ज़ जुबां से,
क्यों इतने फासले तेरे मेरे दरमियां थे,
हां यह सच है कि जिंदगी तुमही हो
पर यह मेरी जुबान पर कहां थे.."

अजनबी के नाम से भी बन संवर कर देखिये

"अजनबी के नाम से भी बन संवर कर देखिये
टूटकर उसकी मुहब्बत में बिखर कर देखिये,
भूल जाएंगे हरिक मंजिल अदू की आप भी
दोस्ती की राह से इक़ दिन गुज़र कर देखिये,
आएगा बेहद मज़ा जीने का भी लेकिन कभी
ज़िन्दगी में आप रंज-ओ-ग़म तो भर कर देखिये,
ग़र समझना है सियासत की जुबाँ शाबान तो
आप वादे से कभी अपने मुकर कर देखिये"